CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kshitij Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary):
'नौबतखाने में इबादत' (यततीन्द्र मिश्र द्वारा रचित) विश्वविख्यात शहनाई वादक 'उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ' के जीवन का एक सजीव व्यक्तिचित्र/रेखाचित्र है। इस पाठ में बिस्मिल्ला खाँ (बचपन का नाम: अमीरुद्दीन) के जीवन के विविध पहलुओं, उनकी संगीत साधना, और बनारस (काशी) के प्रति उनके अथाह प्रेम का वर्णन किया गया है। खाँ साहब 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' (Mixed Culture of India) के सबसे बड़े प्रतीक थे—एक पक्के मुस्लिम (दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ने वाले) होने के वावजूद वे काशी विश्वनाथ और संकटमोचन मंदिर में पूरी श्रद्धा से शहनाई बजाते थे। उनके लिए संगीत ही ईश्वर था, और संगीत का अभ्यास (नौबतखाने में बैठकर बजाना) ही उनकी 'इबादत' (Prarthana/Prayer) थी। 'भारत रत्न' मिलने के बाद भी उनका सादगीपूर्ण जीवन इस पाठ का हृदयस्पर्शी हिस्सा है।
= अर्थ: बिस्मिल्ला खाँ के लिए उनका 'स्वर' (Music) ही सबसे बड़ा ईश्वर था। उनके अनुसार, मंदिर या मस्जिद में जाकर जो प्रार्थना (इबादत) की जाती है, उनके लिए वही प्रार्थना अपनी शहनाई से मधुर और सच्चा 'सुर' निकालने का प्रयास है। संगीत उनके लिए पूजा के समान था।
= अर्थ: 80 वर्ष की उम्र में और देश के सभी सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करने के बावजूद, बिस्मिल्ला खाँ 80 सालों तक खुदा के सामने गिड़गिड़ाकर एक ही दुआ माँगते थे कि हे ईश्वर, मेरे वाद्य-यंत्र (Instrument) को कभी झूठा या बेसुरा मत होने देना, मुझे हमेशा सच्चा सुर प्रदान करना। यह उनकी असीम विनम्रता और कभी खत्म न होने वाली सीखने की चाह को दर्शाता है।
प्रश्न 1: बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की गूँज और काशी का आपस में क्या संबंध है?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ और काशी का संबंध आत्मा और शरीर जैसा है। खाँ साहब ने अपनी शहनाई बजाना काशी के बालाजी (संकटमोचन) मंदिर से ही सीखा था। वे एक पक्के मुसलमान होते हुए भी काशी विश्वनाथ और संकटमोचन मंदिर की ड्योढ़ी (चौखट) पर बैठकर प्रतिदिन शहनाई की मंगलध्वनि निकालते थे। उनका मानना था कि उनकी शहनाई बनारस की मिट्टी की देन है। काशी और गंगा से उनका इतना लगाव था कि जब भी वे विदेश जाते थे, तो शहनाई बजाने से पहले कुछ पल के लिए अपना मुँह बनारस (काशी विश्वनाथ) की दिशा में करके प्रणाम करते थे। काशी के बिना बिस्मिल्ला खाँ अधूरे थे, और उनके बिना काशी की सांस्कृतिक विरासत अधूरी।
प्रश्न 2: बिस्मिल्ला खाँ को 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' (Mili-juli Sanskriti) का प्रतीक क्यों कहा जाता है?
उत्तर: 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' का अर्थ है भारत की मिली-जुली सांस्कृतिक विरासत (जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों का मेल-जोल हो)। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ इसके सबसे बड़े प्रतीक थे। एक सच्चे मुस्लिम के रूप में वे रोज़ पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ते थे और मुहर्रम के जुलूस में गम की शहनाई बजाते थे। ठीक उसी समय, उनके अंदर एक पक्का हिंदुस्तानी बसता था जो संकटमोचन और विश्वनाथ मंदिर में मंगल-स्वर बजाकर अपनी इबादत (भक्ति) व्यक्त करता था। उनके स्वर मंदिर और मस्जिद दोनों स्थानों को समान श्रद्धा से जोडते थे, इसीलिए वे सांप्रदायिक सद्भाव (Communal Harmony) की एक अनूठी और महान मिसाल थे।
प्रश्न 3: बिस्मिल्ला खाँ हमेशा फटी हुई लुंगी (तहमद) क्यों पहनते थे? इस आधार पर उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ सादगी और फक्कड़पन (Simplicity & Detachment) की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका था, फिर भी वे दुनियादारी के दिखावे और बनावटीपन से बिल्कुल दूर थे। जब उनकी एक शिष्या ने उनसे 'फटी लुंगी' पहनने का कारण पूछा (कि इससे आपकी इज़्ज़त कम होती है), तो उन्होंने कहा—"मालिक ने मुझे सुर बख्शा है, लुंगी नहीं; लुंगी सिल जाएगी, पर सुर फट गया तो ठीक नहीं होगा।" यह दर्शाता है कि उनके जीवन का असली आभूषण और संपत्ति उनका 'सुर' और 'शहनाई' है, भौतिक वस्तुएँ (कपड़े या पैसा) नहीं। वे कला के सच्चे पुजारी थे।
प्रश्न 4: जीवन के अंतिम दिनों में बिस्मिल्ला खाँ को काशी के संबंध में किस बात का दुःख (कमी) सताता था?
उत्तर: जीवन के अंतिम पड़ाव पर बिस्मिल्ला खाँ को काशी की बदलती हुई संस्कृति और कम होते हुए आपसी भाईचारे से बहुत दुःख था। वे देखते थे कि काशी की परंपरागत कचौड़ी-जलेबी और मलाई-बरफ बेचने वाले पुराने लोग अब नहीं रहे। इसके साथ ही, हिंदू और मुसलमानों के बीच के मेल-मिलाप (दंगल, संगीत की पुरानी महफ़िलें) में कमी आ रही थी। संगीत और साहित्य का जो निस्वार्थ सम्मान पहले काशी में होता था, वह अब लुप्त हो चुका था। नई पीढ़ी में वह पुरानी लगन और तहज़ीब नहीं बची थी, जो काशी को महान बनाती थी। इसी खोई हुई विरासत को याद करके उनका हृदय व्यथित होता था।